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बदलती पत्रकारिता कहां खो गया सच का आइना

लखनऊ समाज सेवी व कवियत्री सोनी शुक्ला

 

 

 

 : बदलती पत्रकारिता — कहाँ खो गया सच का आईना?

वरिष्ठ समाजसेवी कवित्री सोनी शुक्ला लखनऊ

पत्रकार केवल एक पेशा नहीं, बल्कि समाज का दर्पण है। यह वह माध्यम है जिसके द्वारा आमजन की आवाज़ सत्ता के गलियारों तक पहुँचती है, अन्याय के विरुद्ध स्वर उठता है और जनता को सच का बोध होता है। किंतु दुख की बात यह है कि जिस पत्रकारिता ने कभी स्वतंत्रता संग्राम में जनता को एकजुट किया, सामाजिक चेतना जगाई और परिवर्तन का सूत्रपात किया — वही पत्रकारिता आज स्वयं परिवर्तन के भँवर में फँसी प्रतीत होती है।

 

बीते समय की पत्रकारिता ‘मिशन’ थी, आज ‘प्रोफेशन’ बन गई है। पहले पत्रकार सत्य की खोज में भूख-प्यास भूल जाते थे, जेल की सलाखों के पीछे भी कलम नहीं रुकती थी। उनका उद्देश्य सत्ता को आईना दिखाना और समाज के प्रति अपनी जवाबदेही निभाना होता था। आज स्थिति इसके विपरीत है — जहाँ सत्ता से सवाल पूछने के बजाय पत्रकारिता सत्ता के इशारों पर नाचती नज़र आती है। कहीं विज्ञापन के दबाव ने कलम को कमजोर किया, तो कहीं टीआरपी की होड़ ने सच्चाई का गला घोंट दिया।

 

पत्रकारिता का सबसे बड़ा अवमूल्यन तब शुरू हुआ जब यह पेशा योग्यता और संवेदना से हटकर दिखावे और लाभ का माध्यम बन गया। आज के दौर में न पत्रकारिता की कोई परीक्षा है, न उसके मूल्यों की कोई कसौटी। मोबाइल हाथ में आया और लोग “रिपोर्टर” बन बैठे। कक्षा आठ पास, चार पास या अनपढ़ तक “पत्रकार” कहलाने लगे हैं। पत्रकारिता की यह बाढ़ सत्य के सागर में भ्रम की लहरें पैदा कर रही है। बिना तथ्यों के, बिना प्रमाण के, अफवाहें ‘ब्रेकिंग न्यूज़’ बन रही हैं। “कौआ कान ले गया” जैसी खबरें समाज को गुमराह कर रही हैं और पत्रकारिता की विश्वसनीयता पर प्रश्नचिह्न लगा रही हैं।

 

पत्रकारिता में खबरों का मूल्यांकन सबसे आवश्यक पहलू है। खबर वही है जो तथ्यों पर आधारित हो, जिसे प्रस्तुत करने से पहले प्रमाणित और विश्लेषित किया गया हो। पर आज अधिकांश मीडिया प्लेटफ़ॉर्म पर स्पीड का दबाव सटीकता पर भारी पड़ गया है। कौन पहले खबर दे दे, यह प्रतियोगिता “सत्य” को “संवेदना” से अलग कर रही है। खबरें अब समाज को दिशा देने की बजाय समाज को भटकाने लगी हैं।

 

खबरों के प्रस्तुतीकरण की गरिमा भी धीरे-धीरे लुप्त होती जा रही है। पत्रकारिता अब सवाल पूछने से डरती है, सत्ता को चुनौती देने से कतराती है। जहाँ कलम को तलवार की संज्ञा दी जाती थी, वहीं आज वह विज्ञापन और राजनीतिक नज़दीकियों के बोझ तले दब गई है। आम नागरिक का गुस्सा इसलिए है क्योंकि उसे लगता है कि पत्रकार अब जनता का नहीं, सत्ता का प्रतिनिधि बन गया है। वह खबरों में अपनी बात नहीं, किसी और की इच्छा सुनता है।

 

जरूरत है आत्ममंथन की — पत्रकारिता को अपनी जड़ों की ओर लौटना होगा। सटीक विश्लेषण, निष्पक्ष प्रस्तुति और सामाजिक जिम्मेदारी ही पत्रकारिता की आत्मा हैं। खबरें सनसनी नहीं, संवेदना बनें; आलोचना नहीं, जागरूकता फैलाएँ; और सबसे बढ़कर, सत्य के प्रति अडिग रहें।

 

आने वाला समय तकनीक का होगा, जहाँ कृत्रिम बुद्धिमत्ता और सोशल मीडिया सूचना का मुख्य स्रोत बनेंगे। परंतु इस तकनीकी युग में भी पत्रकार की कलम तब तक सार्थक रहेगी जब तक उसमें सत्य के लिए संघर्ष की भावना जीवित रहेगी। यदि पत्रकारिता ने अपने मूल्यों का पुनरुद्धार नहीं किया, तो यह लोकतंत्र का चौथा स्तंभ नहीं, मात्र मनोरंजन का उपकरण बन जाएगी।

 

पत्रकारिता का भविष्य तभी उज्जवल होगा जब पत्रकार अपने भीतर यह प्रण दोहराएँ — “मैं सत्ता का नहीं, समाज का प्रहरी हूँ; मैं बिकने नहीं, बोलने के लिए पैदा हुआ हूँ।”

यही संकल्प पत्रकारिता को फिर से उस ऊँचाई पर ले जाएगा जहाँ से उसने समाज को प्रकाश दिया था — और जहाँ सच, फिर से, सबसे ऊँचा होगा।

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